क्या बताऊँ, कौन हूँ मैं
जो दूर दूर तक फैला है, वो अमोल चिरमौन हूँ मैं
जो बुझ न सके, वो मशाल हूँ मैं
जो बीते न, वो काल हूँ मैं
हर दिल में आबाद हूँ मैं
हारकर भी नाबाद हूँ मैं
मौत से मैंने जीना सीखा
रो-रो कर मैंने हंसना सीखा
मंज़िल पास नहीं तो क्या
राह आसान नहीं तो क्या
मुझमें वो जूनून तो है
कुछ करने को दिल नासूर तो है
अपनों का साथ नहीं तो क्या
सपनो का संसार तो है
रौशनी मिट गयी तो क्या
कम से कम अंधकार तो है
लेकिन फिर भी, फिर भी
ग़र कल मैं जीत न पाऊ, तो तुम मुझपर पाषाणों कि बरसात करोगे
और यदि मैं जीत भी जाऊ ,तब भी तुम मुझसे न बात करोगे
फिर क्या बताऊँ , कौन हूँ मैं
बेबस हूँ, लाचार हूँ मैं
मैं भी क्या जानू , कौन हूँ मैं
जीव हूँ, या निर्जीव हूँ मैं
जो दूर दूर तक फैला है, वो अमोल चिरमौन हूँ मैं
जो बुझ न सके, वो मशाल हूँ मैं
जो बीते न, वो काल हूँ मैं
हर दिल में आबाद हूँ मैं
हारकर भी नाबाद हूँ मैं
मौत से मैंने जीना सीखा
रो-रो कर मैंने हंसना सीखा
मंज़िल पास नहीं तो क्या
राह आसान नहीं तो क्या
मुझमें वो जूनून तो है
कुछ करने को दिल नासूर तो है
अपनों का साथ नहीं तो क्या
सपनो का संसार तो है
रौशनी मिट गयी तो क्या
कम से कम अंधकार तो है
लेकिन फिर भी, फिर भी
ग़र कल मैं जीत न पाऊ, तो तुम मुझपर पाषाणों कि बरसात करोगे
और यदि मैं जीत भी जाऊ ,तब भी तुम मुझसे न बात करोगे
फिर क्या बताऊँ , कौन हूँ मैं
बेबस हूँ, लाचार हूँ मैं
मैं भी क्या जानू , कौन हूँ मैं
जीव हूँ, या निर्जीव हूँ मैं
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