फिर एक साल बीत गया
फिर एक नए साल कि अगुवाई है
फिर मेरे वहीँ सवाल, फिर मेरा वहीँ कन्फ्यूजीआपन
फिर लोगों के वहीँ जवाब, मेरे सवालों पर उनका खिसियापन
कोई कहता, नए साल में कोई रेजोल्यूशन लो
कोई कहता, नए साल में किसी बुरी आदत को अलविदा ही कहो
मगर हम रेजोल्यूशन के लिए १ जनवरी का इंतज़ार नहीं करते
बुरी आदत को अलविदा कहने को हम मुहूर्त नहीं तकते
एक जनवरी हो या छब्बीस मार्च, सोलह सितम्बर या दिसंबर आठ
सुबह उठकर मुँह धोकर कुल्ला तो हर दिन ही करना होता है
फिर एक जनवरी में क्या ख़ास, क्या नए साल की नयी बात
न दिन नया, न रात नयी
है दीन वहीँ, है ईमान वहीँ
है लोग वहीँ, है सोच वहीँ
कुछ नहीं नया, बस तारीख नयी
३१ दिसम्बर की रात पब, डिस्को में दीवाली होती है
खुद को खोकर, खुद से दूर, दुनिया मदहोशी के जश्न में खोती है
दिखावे कि निष्ठुर दौड़ में, संस्कृति अब पीछे जा रही है
आकाश अभिशप्त, धरती निर्वसन, हृदय दूषित और वायु विषाक्त नज़र आ रही है
जश्न हम भी मनाते हैं, नए साल का नहीं, हर नए पल का
खुद से दूर जाकर नहीं, खुद को खुद के और पास बुलाकर
मदहोशी में नहीं, पूरे होश में आत्मालोचन कर
मन की बंद परते खोलकर
फिर खुद से कुछ बोलकर
हानि-लाभ का लेखा-जोखा नहीं
क्या खोया, क्या पाया का हिसाब नहीं
अब तक जिया हुआ जीवन तौलकर
और फिर जब हृदय से स्वर निकले
कि जो किया, सही समझकर किया
जानकर किसी का दिल नहीं दुखाया
अपना पकाया, खुद अकेले नहीं खाया
निष्ठुरता से नहीं, जीवन कर्म से जिया
तो आने वाला हर पल, हर साल मेरे लिए जश्न बन जाता है
जेब में हाथ डालकर तो देखा नहीं, मगर दिल मेरा राजा हो जाता है
पल बीते, साल बीते, दशक बीते
हम रहेंगे वहीँ, हमारे उसूल वहीँ
हम वहीँ, हमारी सीरत वहीँ, सूरत बदल जाये, तो कह नहीं सकते
हम वहीँ, हमारे सपने वहीँ, सपनों तक पहुँचने के रास्ते बदल जाये, तो कह नहीं सकते
हम वहीँ, हमारे लिए तुम वहीँ, तुम्हारे लिए हम बदल जाएं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, तो बताना ज़रूर,
फिर देखेंगे हम, बदला है तुम्हारा दृष्टिकोण, या वाकई बदल गए हम
फिर एक नए साल कि अगुवाई है
फिर मेरे वहीँ सवाल, फिर मेरा वहीँ कन्फ्यूजीआपन
फिर लोगों के वहीँ जवाब, मेरे सवालों पर उनका खिसियापन
कोई कहता, नए साल में कोई रेजोल्यूशन लो
कोई कहता, नए साल में किसी बुरी आदत को अलविदा ही कहो
मगर हम रेजोल्यूशन के लिए १ जनवरी का इंतज़ार नहीं करते
बुरी आदत को अलविदा कहने को हम मुहूर्त नहीं तकते
एक जनवरी हो या छब्बीस मार्च, सोलह सितम्बर या दिसंबर आठ
सुबह उठकर मुँह धोकर कुल्ला तो हर दिन ही करना होता है
फिर एक जनवरी में क्या ख़ास, क्या नए साल की नयी बात
न दिन नया, न रात नयी
है दीन वहीँ, है ईमान वहीँ
है लोग वहीँ, है सोच वहीँ
कुछ नहीं नया, बस तारीख नयी
३१ दिसम्बर की रात पब, डिस्को में दीवाली होती है
खुद को खोकर, खुद से दूर, दुनिया मदहोशी के जश्न में खोती है
दिखावे कि निष्ठुर दौड़ में, संस्कृति अब पीछे जा रही है
आकाश अभिशप्त, धरती निर्वसन, हृदय दूषित और वायु विषाक्त नज़र आ रही है
जश्न हम भी मनाते हैं, नए साल का नहीं, हर नए पल का
खुद से दूर जाकर नहीं, खुद को खुद के और पास बुलाकर
मदहोशी में नहीं, पूरे होश में आत्मालोचन कर
मन की बंद परते खोलकर
फिर खुद से कुछ बोलकर
हानि-लाभ का लेखा-जोखा नहीं
क्या खोया, क्या पाया का हिसाब नहीं
अब तक जिया हुआ जीवन तौलकर
और फिर जब हृदय से स्वर निकले
कि जो किया, सही समझकर किया
जानकर किसी का दिल नहीं दुखाया
अपना पकाया, खुद अकेले नहीं खाया
निष्ठुरता से नहीं, जीवन कर्म से जिया
तो आने वाला हर पल, हर साल मेरे लिए जश्न बन जाता है
जेब में हाथ डालकर तो देखा नहीं, मगर दिल मेरा राजा हो जाता है
पल बीते, साल बीते, दशक बीते
हम रहेंगे वहीँ, हमारे उसूल वहीँ
हम वहीँ, हमारी सीरत वहीँ, सूरत बदल जाये, तो कह नहीं सकते
हम वहीँ, हमारे सपने वहीँ, सपनों तक पहुँचने के रास्ते बदल जाये, तो कह नहीं सकते
हम वहीँ, हमारे लिए तुम वहीँ, तुम्हारे लिए हम बदल जाएं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, तो बताना ज़रूर,
फिर देखेंगे हम, बदला है तुम्हारा दृष्टिकोण, या वाकई बदल गए हम


