Saturday, November 30, 2013

जय हो...

हर फ़लक से, हर ज़मीं पे,स्वर यहीं बस गूंजता हो
"जय हो" वतन तेरी सदा, प्रतिद्वंदी बन जब तू खड़ा हो


कलाम हो, रहमान हो या कल्पना की बात हो
रक्त के कण- कण में बस "जय हो" की ही फुंकार हो

कुछ इस कदर सीने में तेरे खज़ाना बसा हो इल्म का
न फिर कोई कहे "स्लम डॉग" को प्रतिबिम्ब हिंदुस्तान का

बेशक न हो यहाँ धन-कुबेर, पर स्लम्स भी न हो यहाँ
न हो कोई बच्चा यहाँ, भूख से फिर बिलखता हुआ

"जय हो" सदा उस देश की, जहाँ आतंक का प्रतिकार हो
हर नागरिक के खूं में जहाँ, एक अजब-सा भूचाल हो

मिलकर बनाएं हम सपनो का भारत, जिसमें अमन हो और ईमान हो
झुक जायें देवता भी करने जिसकी "जय हो",जय-जयकार हो


पर फुर्सत किसे है, ज़हमत कहाँ है???

देश की "जय हो", न कोई ऐसा कुछ कर रहा
रहमान कि "जय हो" के झूठे दंभ में संपूर्ण भारत खिल रहा

गर्व तो हमें भी है,"स्लम डॉग" को सफलता मिली जो ग्लोबली
बनी आइना वो हिंदुस्तान का , इसकी भी है शर्मिंदगी

आज हो रही है "जय हो" उस देश की:-
जो कभी मंदिर तो, कभी मस्ज़िद का नाम मांगता है
जहाँ काज़ी मुल्ला रहीम, और पंडित राम मांगता है

"जय हो" हो रही है उस धरती की:-

जहाँ जीवन का हर पल मर के काटती है वो गरीब माँ
जहाँ भूख से बिलखता उसका बच्चा रोटी सरे-आम मांगता है

"जय हो" हो रही है उस वतन की:-

जहाँ भीगी पलकें लिए राह तकती है वो सुहागन रस्ता जिसका
जहाँ उसका शौहर सरहद पे मिट आतंकी की शाम मांगता है


आज फिर उदास है मन, सोचता है:-

क्या वो सांचा टूट गया, जिसमें भगत,सुभाष,खुदीराम ढला करते थे
क्या उनके पास कोई काम न था
या इन्होने अपनी हर बाधा, हर इच्छा, हर मजबूरी का हवन कर दिया था
क्या इन्हें डर नहीं था मरने का
क्या इनकी माताएं बेफ़िक्र थी!!!

कुछ नहीं,बस वक़्त का ये फेर है, तब इन माँओं के लिए पूरा देश बेटा था
और आज के बेटों के लिए खुद की माँ ही गैर है

कैसी माँ, कैसी मातृभूमि और क्या माट्टी का क़र्ज़???
अब देश से ज्यादा, माँ से ज्यादा, खुद की सेवा इनका फ़र्ज़!!!

अरे! फ़िक्र करो नादानों, तुम्हारी बरबादियों के चर्चें हैं असमानों में
समझोगे, तो मिट जाओगे, तुम्हारी दास्ताँ भी होगी दास्तानों में...

देश को दो ऊंचाई वो, की सारी दुनिया नतमस्तक हो जाए
और जब बात हो हिंदुस्तान की, तो "जय हो" की ध्वनि सर्व दिशा में गूँज जाये...

(Written, when Jai Ho song won Oscar)

Saturday, November 23, 2013

मुझमें बोलता मेरा मैं !!!

क्या बताऊँ, कौन हूँ मैं
जो दूर दूर तक फैला है, वो अमोल चिरमौन हूँ मैं

जो बुझ न सके, वो मशाल हूँ मैं
जो बीते न, वो काल हूँ मैं
हर दिल में आबाद हूँ मैं
हारकर भी नाबाद हूँ मैं

मौत से मैंने जीना सीखा
रो-रो कर मैंने हंसना सीखा

मंज़िल पास नहीं तो क्या
राह आसान नहीं तो क्या

मुझमें वो जूनून  तो है
कुछ करने को दिल नासूर तो है

अपनों का साथ नहीं तो क्या
सपनो का संसार तो है
रौशनी मिट गयी तो क्या
कम से कम अंधकार तो है

लेकिन फिर भी, फिर भी

ग़र कल मैं जीत न पाऊ, तो तुम मुझपर पाषाणों कि बरसात करोगे
और यदि मैं जीत भी जाऊ ,तब भी तुम मुझसे न बात करोगे

फिर क्या बताऊँ , कौन हूँ मैं
बेबस हूँ, लाचार हूँ मैं
मैं भी क्या जानू , कौन हूँ मैं
जीव हूँ, या निर्जीव हूँ मैं